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      <title>HINDI ACTIVITY BY AKSH PANDHI AND SHAURYA SHANDILYA by </title>
      <link>https://padlet.com/akshpandhi23/w84njmyvnk96l2wh</link>
      <description></description>
      <language>en-us</language>
      <pubDate>2021-06-06 15:05:38 UTC</pubDate>
      <lastBuildDate>2023-04-22 06:08:26 UTC</lastBuildDate>
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         <title>र’ के विभिन्न रूप -</title>
         <author>akshpandhi23</author>
         <link>https://padlet.com/akshpandhi23/w84njmyvnk96l2wh/wish/1588047333</link>
         <description><![CDATA[<div>‘<strong><em>र’ एक व्यंजन वर्ण है। उच्चारण की दृष्टि से यह लुंठित व्यंजन ध्वनि है।</em></strong></div><div><strong><em>हिंदी भाषा में ‘र’ के विभिन्न रूपों का प्रयोग होता है। कहीं पर ‘र’ का प्रयोग स्वर रहित होता है तो कहीं पर स्वर सहित।</em></strong></div><div><strong><em>जिसमें ‘अ’ की ध्वनि हो वह&nbsp; स्वर सहित (क, च, ट, त, प) जिसमें ‘अ’ की ध्वनि न हो वह&nbsp; स्वर रहित (क्, च्, ट्, त्, प्)</em></strong></div><div><strong><em>‘र’ के विभिन्न रूप - र, रा, रु, रू, र्र, क्र, ट्र, ह्र र’ का सामान्य रूप</em></strong></div><div><strong><em>‘र’ रमन, दरवाजा, दीवार</em></strong></div><div><strong><em>‘र’ के सामान्य रूप का प्रयोग में ‘र’ शब्द के आरंभ में, मध्य में और अंत में आ सकता है।</em></strong></div><div><strong><em>‘र’ में सभी मात्राएँ लग सकती है सिवाय ‘ऋ’ और हलंत (्) के, जैसे -</em></strong></div><div><strong><em>र, रा, रि, री, रु, रू, रे, रै, रो, रौ&nbsp;</em></strong></div><div><strong><em>र+उ=रु (रुद्र, रुचि, पुरुष, गुरु, रुपया)</em></strong></div><div><strong><em>र+ऊ=रू (रूप, रूठना, अमरूद, डमरू, रूखा)</em></strong></div><div><br></div><div><strong><em>रेफ</em></strong></div><div><strong><em>यह रेफवाला ‘र’ कहलाता है। यह स्वर रहित ‘र’ है।</em></strong></div><div><strong><em>&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; शब्दों में इसका प्रयोग होते समय इसके उच्चारण के बाद आने वाले वर्ण की अंतिम मात्रा के ऊपर लग जाता है, जैसे-</em></strong></div><div><strong><em>परव = पर्व</em></strong></div><div><strong><em>जुरमाना = जुर्माना &nbsp;</em></strong></div><div><strong><em>वरणन = वर्णन</em></strong></div><div><strong><em>&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; कुछ ऐसे शब्द जिसमें ‘र’ के बाद का वर्ण भी स्वर रहित हो तो रेफ का प्रयोग उसके अगले वर्ण के सिर पर लगता है, जैसे-</em></strong></div><div><strong><em>व् + अ + र् + ण् + य् + अ = वर्ण्य</em></strong></div><div><strong><em>अ + र् + घ् + य् + अ = अर्घ्य</em></strong></div><div><strong><em>विशेष द्रष्टव्य</em></strong></div><div><strong><em>कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिसमें दो रेफों का प्रयोग लगातार होता है, जैसे- धर्मार्थ, पूर्वार्ध, वर्षर्तु।</em></strong></div><div><strong><em>रेफ का प्रयोग कभी भी किसी भी शब्द के पहले अक्षर में नहीं लग सकता।&nbsp; &nbsp;</em></strong></div><div><strong><em>vस्वर वर्ण ‘ई’ के सिर पर लगा चिह्न और रेफ का चिह्न एक समान होता है, प्रयोग के समय ध्यान दें।</em></strong></div><div><strong><em>‘र’ के ऊपर भी रेफ का प्रयोग हो सकता है, जैसे- खर्र-खर्र, अंतर्राष्ट्रीय इत्यादि। &nbsp;</em></strong></div><div><br></div><div><strong><em>नीचे पदेन</em></strong></div><div><strong><em>‘</em></strong><strong><em><sub>^</sub></em></strong><strong><em>’ यह ‘र’ का नीचे पदेन वाला रूप है।‘र’का यह रूप भी स्वर रहित है। यह ‘र’ का रूप अपने से पूर्व आए व्यंजन वर्ण में लगता है। पाई वाले व्यंजनों के बाद प्रयुक्त ‘र’ का यह रूप तिरछा होकर लगता है, जैसे- क्र, प्र, म्र इत्यादि।</em></strong></div><div><strong><em>जिन व्यंजनों में एक सीधी लकीर ऊपर से नीचे की ओर आती हैं उसे ही हम खड़ी पाई वाले व्यंजन कहते हैं, जैसे – क, ख, ग, च, म, प, य इत्यादि</em></strong></div><div><strong><em>&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; पाई रहित व्यंजनों में नीचे पदेन का रूप </em></strong><strong><em><sub>^</sub></em></strong><strong><em>&nbsp; &nbsp;इस तरह का होता है, जैसे- राष्ट्र , ड्रम, पेट्रोल, ड्राइवर इत्यादि।</em></strong></div><div><strong><em>जिन व्यंजनों में एक सीधी लकीर ऊपर से नीचे की ओर बहुत थोड़ी मात्रा में आती हैं उसे ही हम पाई रहित&nbsp; वाले व्यंजन कहते हैं, जैसे – ट, ठ, द, ड, इत्यादि</em></strong></div><div><br></div><div><strong><em>‘द’ और ‘ह’ में जब नीचे पदेन का प्रयोग होता है तो ‘द् + र = द्र’ और&nbsp; ‘ह् + र = ह्र’ हो जाता है, जैसे- दरिद्र, रुद्र, ह्रद, ह्रास इत्यादि।</em></strong></div><div><strong><em>‘त’ और ‘श’ में जब नीचे पदेन का प्रयोग होता है तो ‘त् + र = त्र’ और ‘श् + र = श्र’ हो जाता है, जैसे – त्रिशूल, नेत्र, श्रमिक, अश्रु इत्यादि।<br></em></strong><br></div><div><strong><em>विशेष द्रष्टव्य</em></strong></div><div><strong><em>^ का प्रयोग केवल ‘ट’ और ‘ड’ व्यंजन वर्णों के साथ ही होता है। ‘ड्र’ से अधिकतर अंग्रेज़ी शब्दों का ही निर्माण होता है।&nbsp;</em></strong></div><div><strong><em>कुछ शब्द ऐसे हैं जिनमें दो नीचे पदेन का प्रयोग एक ही शब्द में हो सकता है, जैसे- प्रक्रम, प्रकार्य इत्यादि&nbsp;</em></strong></div><div><strong><em>कुछ शब्द ऐसे हैं जिनमें नीचे पदेन और रेफ का प्रयोग शब्द के एक ही वर्ण में हो सकता है, जैसे- आर्द्र, पुनर्प्रस्तुतिकरण इत्यादि ।&nbsp; &nbsp;</em></strong></div><div><br></div><div><br></div>]]></description>
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         <pubDate>2021-06-06 15:19:07 UTC</pubDate>
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         <title>अनुस्वार -</title>
         <author>shauryas20potter3</author>
         <link>https://padlet.com/akshpandhi23/w84njmyvnk96l2wh/wish/1588048063</link>
         <description><![CDATA[<div><strong><em>अनुस्वार स्वर के बाद आने वाला व्यंजन है। इसकी ध्वनि नाक से निकलती है। हिंदी भाषा में बिंदु अनुस्वार (ं) का प्रयोग विभिन्न जगहों पर होता है। हम जानेंगे की कब और क्यों इनका प्रयोग किया जाता है।<br><br>पंचम वर्णों के स्थान पर<br><br>अनुस्वार (ं) का प्रयोग पंचम वर्ण ( ङ्, ञ़्, ण्, न्, म् - ये पंचमाक्षर कहलाते हैं) के स्थान पर किया जाता है। जैसे -<br>गड्.गा - गंगा<br>चञ़्चल - चंचल<br>झण्डा - झंडा<br>गन्दा - गंदा<br>कम्पन - कंपन<br><br>अनुस्वार को पंचम वर्ण में बदलने का नियम -<br><br>अनुस्वार के चिह्न के प्रयोग के बाद आने वाला वर्ण ‘क’ वर्ग, ’च’ वर्ग, ‘ट’ वर्ग, ‘त’ वर्ग और ‘प’ वर्ग में से जिस वर्ग से संबंधित होता है अनुस्वार उसी वर्ग के पंचम-वर्ण के लिए प्रयुक्त होता है।<br><br>नियम -<br><br>• यदि पंचमाक्षर के बाद किसी अन्य वर्ग का कोई वर्ण आए तो पंचमाक्षर अनुस्वार के रूप में परिवर्तित नहीं होगा। जैसे- वाड्.मय, अन्य, चिन्मय, उन्मुख आदि शब्द वांमय, अंय, चिंमय, उंमुख के रूप में नहीं लिखे जाते हैं।<br>• पंचम वर्ण यदि द्वित्व रूप में दुबारा आए तो पंचम वर्ण अनुस्वार में परिवर्तित नहीं होगा। जैसे - प्रसन्न, अन्न, सम्मेलन आदि के प्रसंन, अंन, संमेलन रूप नहीं लिखे जाते हैं।<br>• जिन शब्दों में अनुस्वार के बाद य, र, ल, व, ह आये तो वहाँ अनुस्वार अपने मूल रूप में ही रहता है। जैसे - अन्य, कन्हैया आदि।<br>• यदि य , र .ल .व - (अंतस्थ व्यंजन) श, ष, स, ह - (ऊष्म व्यंजन) से पहले आने वाले अनुस्वार में बिंदु के रूप का ही प्रयोग किया जाता है चूँकि ये व्यंजन किसी वर्ग में सम्मिलित नहीं हैं। जैसे - संशय, संयम आदि।</em></strong></div>]]></description>
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         <pubDate>2021-06-06 15:19:56 UTC</pubDate>
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      <item>
         <title>नुक़्ता </title>
         <author>akshpandhi23</author>
         <link>https://padlet.com/akshpandhi23/w84njmyvnk96l2wh/wish/1588053317</link>
         <description><![CDATA[<div><strong><br></strong><strong><em>नुक़्ता की परिभाषा -&nbsp; मूल रूप से 'नुक़्ता' अरबी भाषा का शब्द है और इसका मतलब 'बिंदु' होता है। साधारण हिन्दी-उर्दू में इसका अर्थ 'बिंदु' ही होता है।<br>नुक़्ता देवनागरी, गुरमुखी और अन्य ब्राह्मी परिवार की लिपियों में किसी व्यंजन अक्षर के नीचे लगाए जाने वाले बिंदु को कहते हैं। इस से उस अक्षर का उच्चारण परिवर्तित होकर किसी अन्य व्यंजन का हो जाता है।<br></em></strong><br></div><div><strong><em>जैसे -</em></strong></div><div><strong><em>'ज' के नीचे नुक्ता लगाने से 'ज़' बन जाता है और 'ड' के नीचे नुक्ता लगाने से 'ड़' बन जाता है।</em></strong></div><div><strong><em>नुक़्ते ऐसे व्यंजनों को बनाने के लिए प्रयोग होते हैं, जो पहले से मूल लिपि में न हों, जैसे कि 'ढ़' मूल देवनागरी वर्णमाला में नहीं था और न ही यह संस्कृत में पाया जाता है।<br>कुछ नुक़्ता वाले शब्द</em></strong></div><div><strong><em>कमज़ोर, तूफ़ान, ज़रूर, इस्तीफ़ा, ज़ुल्म, फ़तवा, मज़दूर, ताज़ा, फ़कीर, फ़रमान, इज़्ज़त आदि।</em></strong></div><div><strong><em><br></em></strong><br></div><div><strong><br></strong><br></div>]]></description>
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         <pubDate>2021-06-06 15:25:28 UTC</pubDate>
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      </item>
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         <title>अनुनासिक -</title>
         <author>shauryas20potter3</author>
         <link>https://padlet.com/akshpandhi23/w84njmyvnk96l2wh/wish/1588058016</link>
         <description><![CDATA[<div><strong><em>अनुनासिक स्वरों के उच्चारण में मुँह से अधिक तथा नाक से बहुत कम साँस निकलती है। इन स्वरों पर चन्द्रबिन्दु (ँ) का प्रयोग होता है जो की शिरोरेखा के ऊपर लगता है।<br><br>जैसे - आँख, माँ, गाँव आदि।<br><br>अनुनासिक के स्थान पर बिंदु का प्रयोग<br><br>जब शिरोरेखा के ऊपर स्वर की मात्रा लगी हो तब सुविधा के लिए चन्द्रबिन्दु (ँ) के स्थान पर बिंदु (ं) का प्रयोग करते हैं। जैसे - मैं, बिंदु, गोंद आदि।<br><br>अनुनासिक और अनुस्वार में अंतर<br><br>अनुनासिक स्वर है और अनुस्वार मूल रूप से व्यंजन है। इनके प्रयोग में कारण कुछ शब्दों के अर्थ में अंतर आ जाता है। जैसे - हंस (एक जल पक्षी), हँस (हँसने की क्रिया)।<br><br>&nbsp;अनुनासिक शब्द<br><br>• धूल- गाँव, मुँह, धुँधले, कुआँ, चाँद, भाँति, काँच।<br><br>• दुःख का अधिकार- बाँट, अँधेर, माँ, फूँकना, आँखें।<br><br>• एवरेस्ट: मेरी&nbsp; शिखर यात्रा- बाँधकर, पहुँच, ऊँचाई, टाँग, पाँच, दाँते, साँस।<br><br>• तुम कब जाओगे, अतिथि- धुआँ, चाँद, काँप, मँहगाई, जाऊँगा।<br><br>• वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्रशेखर वेंकट रामन्- ढूँढने, ऊँचे, भाँति।<br><br>• कीचड़ का काव्य- रँगी, अँगूठा, बाँधकर।<br><br>• धर्म की आड़- मियाँ, अजाँ।<br><br>• शुक्रतारे के समान- जालियाँवाला, ऊँगली, ठूँस, गूँथ।</em></strong></div>]]></description>
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         <pubDate>2021-06-06 15:31:14 UTC</pubDate>
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