<?xml version="1.0"?>
<rss version="2.0">
   <channel>
      <title>जीवन एक कविता  by Pushpa Sika</title>
      <link>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw</link>
      <description>बिखरती सी काया को कविताओं का सहारा</description>
      <language>en-us</language>
      <pubDate>2024-01-24 05:24:33 UTC</pubDate>
      <lastBuildDate>2025-05-26 10:56:06 UTC</lastBuildDate>
      <webMaster>hello@padlet.com</webMaster>
      <image>
         <url>https://padlet-uploads.storage.googleapis.com/2264187954/89d1bbc5400f656f41f0433f56c75a44/people_2575936_1280.jpg</url>
      </image>
      <item>
         <title>नदियाँ </title>
         <author>pushpasika23</author>
         <link>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2859810460</link>
         <description><![CDATA[<p>अपना मार्ग स्वयं बनाये, जिसको कोई रोक न पाये,</p><p>मानों जैसे मद में चूर, बहना ही है इसका नूर। </p><p><br/></p><p>होती है ये  बचपन जैसी, मस्ती भरी और उमंग भरा। </p><p><br/></p><p>पर्वत से यह गिरती है, चट्टानों से टकराती है,</p><p>दुःख दर्द का पता न इसको, कितनी चोटें खाती है। </p><p>एक गति में चलती है, मानव से यह कहती है,</p><p>जीवन में तुम हार न मनो, लक्ष्य बनाये बहती है। </p><p><br/></p><p>अंचल में झरना बन कर, मनो ऐसे बहती है,</p><p>हो जैसे करुणा की देवी, मानव से यह पूजित है। </p><p><br/></p><p>जोश भरा है इतना इसमें, जितना की यौवन में,</p><p>परवाह किये बिना यह हल के, रिसती हे भू-तल  में। </p><p>कुल किनारे दो है इसमें, खुशियों के और गम के,</p><p>तौल न पाये कोई इसको, ज्यादा से या कम से। </p><p><br/></p><p>उद्गम से बहती आती है, सागर में मिल जाती है,</p><p>इन सब के बीच, मानव को वो क्या-कुछ सिखला जाती है। </p>]]></description>
         <enclosure url="https://padlet-uploads.storage.googleapis.com/2264187954/ef1196185b05987048b48558b06578c3/river.jfif" />
         <pubDate>2024-01-24 08:10:40 UTC</pubDate>
         <guid>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2859810460</guid>
      </item>
      <item>
         <title>कहानी और हकीकत </title>
         <author>pushpasika23</author>
         <link>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2878187717</link>
         <description><![CDATA[<p>कहानियों में ही अच्छी लगती है ये संघर्ष कि दास्ता,</p><p>हकिकत मे ,वो प्रत्येक विपरीत परिस्थिती तमाशा लगता है इन्हें..</p><p>इन्हें प्रेमिकायें भी कहानियों वाली चाहिये,</p><p>हकीकत ये है कि ..सच्ची कहानियों में भी कुछ किस्से छिपा दिये जाते हैं।</p><p>लक्ष्मण जी का अपने भ्राता के साथ वनवास को जाना,</p><p>इन्हें प्रेम,सम्मान और समर्पण लगता है.. </p><p>हकीकत मे कोई ऐसा करे.. तो वो गैर-जिम्मेदार  कहे जायेंगे ।</p><p>कहा जायेगा की भ्राता से ही इतना प्रेम था, तो उर्मिला को ब्यहा ही क्यों..?</p><p>बुद्ध जी को भी ये त्याग का, ज्ञान का प्रतिक मानते हैं,</p><p>हकिकत मे देखतेे तो शायद कोसने लगते,</p><p>शायद कुछ छोटी-छोटी मिथ्य कथायें भी बनती,</p><p>और हाँ, इन्हें सम्मान भी हजम नहीं होती,</p><p>कहानियों में जिसे ये व्यवहार कहते हैं, हकीकत  मे उसे दिखावा,</p><p>एक चलन और है इन दिनों, हकीकत मे रोते इंसानों को भी ये,</p><p>उसी नाटक(drama) का हिस्सा बताते हैं, </p><p>जिसकी अजीब सी कहानियों पर ये आँसुओं कि लडि़याँ  बिछाते हैं..</p><p>जमा़ना बुरा है ये कहना भी गलत होगा,</p><p>क्योंकि ये उनका चयन है..</p><p>वो कहानियाँ सुनना पसंद  हैं, उन कहानियों में शामिल होना नहीं,</p><p>किस्से तो हजार हैं इनके पास, पर किताबों कि एक भी निशानी ही नहीं।</p><p>                           </p>]]></description>
         <enclosure url="https://padlet-uploads.storage.googleapis.com/2264187954/5cc1ad1a6b5aa2074d2175978e99418c/old_books_hal_halli.jpg" />
         <pubDate>2024-02-08 16:20:52 UTC</pubDate>
         <guid>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2878187717</guid>
      </item>
      <item>
         <title>कुछ तो  तुम कही जाओगी....... </title>
         <author>pushpasika23</author>
         <link>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2878263356</link>
         <description><![CDATA[<p>जिन विचारों की तराजू में तुम तौली जा रही होगी,</p><p>वो आजाद विचारों से थोडी़ असंतुलित होगी,</p><p>हर बार विचार तुम्हारे हिस्से में, कुछ ज्यादा होंगी,</p><p>तुम्हारी एक गलती हो भले, पर जमा़नें के लिये वो चार होगी,</p><p>वो रात को काम से देर से लौटना,तुम्हारी मजबुरी हो भले,</p><p>कुछ नजरों में वो तुम्हारी शौंक होगी,</p><p>और... टिफिन न ले जानें पर ..शायद तुम उनके विचारों में अमीर होगी।</p><p>पाई-पाई पैसे बचाना किसी को कंजूसी भी लगे शायद,</p><p>हर काम वक्त पर करना फरहोशी भी लगे शायद,</p><p>शायद तुम चोर भी कही जाओगी.....</p><p>जब किसी कि जुठी थाली से खुदके लिये रोटियाँ उठाओगी..</p><p>कुछ रिश्तें भी बनेंगें तुम्हें जलिल करने को,</p><p>जिन रिश्तों से शायद तुम खुद भी अंजान होगी,</p><p>तेरे अकेले निरंतर बढ़ते रहना शायद किसी को शक मे भी डाले...</p><p>तेरे कानों तक सूर पहुँचेंगी तेरे काल्पनिक वर्णित चरित्र वाले...!</p><p>शायद किसी से उम्मीद भी लगा बैठे तू..</p><p>पर गौर से सुन-</p><p>तेरी कहानी सिर्फ तुझे पता है,</p><p>ये  कह रही है दुनिया, जो उन्हें लगता है उन्हें तेरे बारे में तुझसे ज्यादा पता है,</p><p>तो रहने दे इस गलतफहमी में औरों को तू..</p><p>तेरे प्रयासों पर यूँ ही कायम रह तू,</p><p>तू तेरी कमजोरियों को मार गिरा,</p><p>वक्त पर छोड़ तेरी जवाबदेही ,और चलनें दे ये जिंदगी का काफिला..।</p><p>                       </p>]]></description>
         <enclosure url="https://padlet-uploads.storage.googleapis.com/2264187954/688fb764c9dacd21f949df11fb2398eb/working_women.jpg" />
         <pubDate>2024-02-08 17:18:28 UTC</pubDate>
         <guid>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2878263356</guid>
      </item>
      <item>
         <title>ठहराव</title>
         <author>pushpasika23</author>
         <link>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2879764117</link>
         <description><![CDATA[<p><br></p><p>ठहराव सफर का हिस्सा है मेरे।</p><p>मेरा मुझ पर से नियंत्रण खोते जो नजर आये,</p><p>मैं खुदको थामते हुये ठहर जाती हूँ।</p><p>गर ऐसा नहीं किया तो परिणाम से वाकिफ हूँ मैं...</p><p>आज मुझे मौका दिया है इसनें,</p><p>गर मैंनें अपनी बारी ऐसे ही खो दी..तो इसके खेल से भी वाकिफ हूँ मैं..</p><p>मैं इसे हरा ही दूंगी ऐसा नहीं मत मेर।</p><p>पर हाँ! इसके वार से होनें वाली हानियों के लिये,</p><p>दृढ़ काया अवश्य निर्मित कर लूँ।</p><p>ठहराव में किये चिंतन ... काफि है इसे मात देनें को,</p><p>तुम्हे शायद लगे कि सोचनें मात्र से क्या ही हो जायेगा..?</p><p>पर बात ये भी तो सच है, </p><p>जो जैसा सोचेगा, वैसा हो जायेगा।</p><p>मैं गवाह भी हूँ इस बात का,</p><p>हवा के थपेड़े मैंनें पतंग बनकर झेले हैं,</p><p>नदियों के ठोकर पत्थर बनकर,</p><p>मैंनें दिया बनकर खुदको जलते भी देखा है,</p><p>और कभी विरानी रात कि अंधियारी बनकर....</p><p>जिस रणभूमि में मैं खुदको रोज झोंकती हूँ,</p><p>तनिक भी लगे की जिंदगी मुझे मुझसे छिनने कि मंशा लिये ,मुझे हरानें ही वाली है,</p><p>मैं रणभूमि छोड़ देती हूँ...।</p><p>ऐसा नहीं कि हार गयी मैं, उसे ठहराव का प्रस्ताव देती हूँ।</p><p>मुझे लगता हैं वो भी मुझी को जितते हुये देखना चाहता है,</p><p>क्योंकि मेरे हर प्रस्ताव को बडी़ विनम्रता से स्वीकारता है...।</p><p>और मैं पिछली सारी अनुभवों को समेटते हुये...</p><p>ठहराव कि गोद में ठहरी-सी सो जाती हूँ।</p>]]></description>
         <enclosure url="https://padlet-uploads.storage.googleapis.com/2264187954/869f3dea996df2e7aa8d1c106ab256cc/pngtree_woman_sits_on_a_bench_in_a_park_picture_image_2473177.jpg" />
         <pubDate>2024-02-10 10:43:59 UTC</pubDate>
         <guid>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2879764117</guid>
      </item>
      <item>
         <title>जमा़ना जरा देख अपनी प्रगति तू</title>
         <author>pushpasika23</author>
         <link>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2882082065</link>
         <description><![CDATA[<p>जमा़ना जरा देख अपनी प्रगति तू</p><p>मानव तस्करी के हुकूम ,मजबूरियाँ हो गई !</p><p>कभी मदिरा औषधि कही जाती थी,</p><p>अभी इसकी भी लोगों को लत हो गई ,</p><p>मेले खुशियों के प्रतीक होते थे कभी</p><p>अब वो बस एक मिथ हो गई ।</p><p><br/></p><p>खौफ होने लगा है लोगों को लोगों से ,</p><p>विधाता कि न जाने कैसी रीत हो गई,</p><p>भूखी पेट के खातिर जो सिध्दांत तोडे़ हमनें ,</p><p>तब खुद के जमी़र पर भी शक हो गई.....!</p><p>सुर -ताल की तलाश मे , संगीत सुनते थे कभी,</p><p>अब इन संगीतों से न जाने, मन ये क्यों भयभीत हो गई...?</p><p>कहाँ क्या बोलें, कहाँ क्या न बोलें....</p><p>ये सोचना जरुरी न समझते अब लोग </p><p>इनहें बस अपनी बातों को कहनें कि जिद्द हो गई ।</p><p>जमा़ना देख तेरी प्रगति कितनी भयभीत हो गई ।।</p><p><br/></p><p>धरम-धरम का जाप हो रहा,</p><p>और मानव धरम मे भेद हो गई,</p><p>ये तो कम ही कह दिया मैंनें,</p><p>यहाँ तो तरल सी बहती थी जो रक्त देह मे,</p><p>न जाने कब से ,कतरों में बहानें कि रीत हो गई ।</p><p><br/></p><p>क्या चोरी, क्या गाली, क्या गुस्सा, क्या ताली,</p><p>क्या झूठ, क्या बीमारी, क्या भूख और क्या मवाली ??</p><p><br/></p><p>इन्हें मैं बूरा कहनें जो लगू़ँ....</p><p>के एक कहानी बेहूदी कि कहनें लगूँ..!</p><p>कि दूसरी इन हदों को भी लांघती किरदार बन गई,</p><p>पुरानें किस किस्से को भयानक कहूँ मैं ...?</p><p>नई तो पिछली दास्तां को भी चिरती हुई ,उससे भी</p><p>खौफनाख बन गई ।</p><p><br/></p><p>किस किस्से को पढ़ के ये कह दूँ ,</p><p>इससे भी बूरा भला क्या होगा..?</p><p>सुना है घोर कलयुग में इससे भी बुरा होगा....!</p><p><br/></p><p>देखती हूँ और सोचती हूँ,</p><p>न जाने किस हद तक ये दुनिया बिगडे़गी,</p><p>मौत - मौत का नारा है, ये देह मिट्टी का पिटारा है,</p><p>न जाने फिर ये सब क्यों हो रहा...!</p><p>और न जानें ये सब जानते हुये भी मानवता आँखें खोले</p><p>क्यों सो रहा ....!</p>]]></description>
         <enclosure url="https://padlet-uploads.storage.googleapis.com/2264187954/7425a1fc8036cd556fa5e827d65191a1/istockphoto_1155133747_612x612.jpg" />
         <pubDate>2024-02-13 11:04:39 UTC</pubDate>
         <guid>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/2882082065</guid>
      </item>
      <item>
         <title>प्रकृति की माया </title>
         <author>pushpasika23</author>
         <link>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/3007478782</link>
         <description><![CDATA[<p>घोर अंधेरी रात कि साया, फीकी पड़ती नजर आयी,</p><p>पूरब में अंजोर से पहले,अंधेरे ने मार खायी।          आसमान कि दशा देखकर सब किंचित उठ जाते हैं,       बिना सूर्य के उदय से भी, हल्की रोशनी पाते हैं।            जब नज़रें आकाश को देखे क्षण भर ऐसा लगता है,</p><p>कोरे से काग़ज मे किसी ने, गिट्टी का गीला मूरम फेका है।</p><p> </p><p>ना तेज ताप का प्रकाश लिये ,न आँखों को चमकाता है,</p><p>हल्की -सी प्रकार लिये वह सुबह-सुबह जब आता है।</p><p>इन्हें देखकर आसमान भी उत्साहित हो इठलाते हैं</p><p>स्वयं गेरूआ वस्त्र धारण किया हो,ऐसी छवि बनाते हैं।</p><p>   </p><p>यूँ सपनों सा लगता सारा, क्षण में टूट जाता है,</p><p>अब जो देखे आकाश कि ओर तो,नीले समंदर को पाता है,</p><p>कुछ ऐसा आकाश लगे अब.......</p><p>सूर्य से बनती छाया है, झिलमिल-सी सागर मे,</p><p>यह चमकती- सी एक काया है।</p><p>अंधेरे कि रात मिटी अब, अंजोर-ही-अंजोर आया है,</p><p>फिर से उसका वक्त आयेगा, यही तो प्रकृति की माया है।</p>]]></description>
         <enclosure url="https://padlet-uploads.storage.googleapis.com/2264187954/12ac97a2ce247ac9e14234c031d60605/padlet1.jpg" />
         <pubDate>2024-05-26 10:41:39 UTC</pubDate>
         <guid>https://padlet.com/pushpasika23/q54gs1ad0lrlmohw/wish/3007478782</guid>
      </item>
   </channel>
</rss>
