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      <title>नियत और नियती  by Pushpa Sika</title>
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      <language>en-us</language>
      <pubDate>2024-01-24 05:04:01 UTC</pubDate>
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         <title>बचपन का वो एक अनोखा किस्सा</title>
         <author>pushpasika23</author>
         <link>https://padlet.com/pushpasika23/jz8jy9paoqy3toa4/wish/2852927986</link>
         <description><![CDATA[<p>आज से लगभग नौ  साल पहले, जब मैंनें प्राथमिक विद्यालय की वार्षिक परीक्षा  को उत्तीर्ण  कर अपनी दाखिला माध्यमिक विद्यालय  में करवाई थी।   तब शुरुवात के कुछ दिन  बिल्कुल सामान्य थे ,परन्तु वो दिन भी अब सामने आ चुकी थी ,जहाँ शिक्षक मुझसे अवगत होते।  सुबह के कुछ ७ बज रहे थे मैं और मेरी बहन स्कूल के लिए निकलते हुए माँ  से अपने -अपने  लिए पैसे लिए  कुछ खाने को ,और स्कूल पहुँच गए। भोजन अवकास तक सब सामान्य था।इस बिच मैं मेरी सहपाठियों के साथ विद्यालय के मैदान में खेल रही थी  और अचानक मेरी बहन मुझसे वो पैसे लेने आयी ,जो हमने माँ से ली थी। </p><p>       </p><p> मैनें उसे मेरे कक्षा में जाकर बस्ते से पैसे निकालने को कह दिया ,वो गयी और उसने पैसे निकालकर खर्च भी कर दिए। जैसे ही विद्यालय के घंटी की आवाज मेरे कानों तक पहुंची ,मेरे नज़रों के  सामने वो कुछ अनोखे सिक्कों की प्रतियां आ गयी  जिसे मैंने बचपन से सहेज कर रखे थे। मैं दौड़ती हुई  कक्षा में जाते ही अपने बस्ते के हर एक खंड को जांचनें लगी । .. और हुआ वही जिसका मुझे  डर था...।</p><p>उसने वही सिक्का निकाल लिया था जो मेरे इकट्ठे किये सिक्कों मे से एक था। </p><p> और फिर क्या था मैं उसकी  चलती  हुए कक्षा  के बिच से उसे बुलाई और गहरी सांस लेते हुए पूछी  उसके उत्तर ने मेरे आँखों में आंसू ला दिए। </p><p>अब मैं स्कूल के मंच पर जा कर रोने लगी की मुझे वही सिक्का चाहिए। </p><p>धीरे -धीरे सभी शिक्षकों तक बात गयी और सारे शिक्षक अपनी कक्षाएं छोड़ कर मुझे चुप  कराने को आये।  सबने मुझे अनेक प्रकार से चुप कराने की कोशिश की  और  अपने पास रखे सारे सिक्के ,पेन ,चॉकलेट और पैसे इस वादे के साथ दे रहे थे की वो कल मुझे उससे भी अच्छा सिक्का लाकर देंगे। </p><p>उस दो रुपये के सिक्के को उस दिन पास के सारे दुकानों ,फैंसी ,गुपचुप ठेले और तो और विद्यालय के सभी छात्रों ने भी अपने -अपने बस्ते की जांच करते हुये ढुंडनें कि कोशिश की। </p><p>वो सिक्का तो मुझे मिला नहीं पर हाँ ;मेरी वजह से सभी छात्राएं बहुत खुश थी क्योंकि मेरे  चलते  भोजन अवकास के बाद की कोई भी कक्षाएं नहीं हुई और ऐसा इसलिए था क्योंकि वो सरे शिक्षक मुझे चुप कराने को मेरे पास थे ।</p>]]></description>
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         <pubDate>2024-01-18 06:15:20 UTC</pubDate>
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         <title>पहले कार्य का पहला दिन</title>
         <author>pushpasika23</author>
         <link>https://padlet.com/pushpasika23/jz8jy9paoqy3toa4/wish/2859658141</link>
         <description><![CDATA[<p>भारत के संविधान में लिखि "बाल मजदूरी" को मेरे ख्याल से "बाल मजबूरी" लिखना चाहिये था क्योंकि मुझे नहीं लगता कि ये गलत है कि कोई इंसान अपनी मजबूरियों, जिम्मेदारियों कि पूर्ति करने हेतु कोई कार्य करे, तो उसे बाल मजदूरी का नाम देकर उनकी मजबूरियाँ बढा़ दी जाये।<br><br>हाँ! पर वर्तमान समय इस अजीब सी सोच को पिछे कर रही है, क्योंकि अब मैं किशोरावस्था के साथ एक हाथ मे शिक्षा और एक हाथ में जिम्मेदारियाँ लिये बहुत से लोगों को हर सुबह घर से निकलते देखती हूँ।<br><br>एक किस्सा जो हर उस बच्चे को मजबूरी के कारण खुदके जीवन में शामिल करना पड़ता है, वो है 'पहले कार्य का पहला दिन'। मैंनें इसे मजबूरी इसलिए कहा क्योंकि वक्त से पहले ये किस्सा हम अपने जीवन में शामिल करते हैं और पहले कार्य के पहले दिन में जो हमें महसूस होता है शायद उसका कारण ये एक शब्द है जिसे 'मजबूरी' कहते हैं।<br><br>हम खुद कमायेंगें, खुदकी ख्वाहिशें पूरी करेंगें, किसी भी कार्य के लिये किसी दूसरे पर आश्रित नहीं होना पड़ेगा, जिम्मेदारियाँ पूरी करेंगें, अब हमारी भी बातें सुनी जाएँगी, हम भी घर के बैठक में अपनी बात रख पायेंगें, माँ के लिये कुछ खरीदेंगें, पिता जी कि जिम्मेदारियाँ कुछ कम करेंगें, और न जानें कई ऐसी चिजें हैं जो हमारे कार्य पर जाने से बदल सकती है़। पर फिर भी जब हम उस नये माहोल में जहाँ हमारे लिये सबकुछ नया होता है -- नये लोग, नई बातें, नये पहचान। मुझे लगता है ये ही एक ऐसी चीज है, जो नया होने पर भी हमें उतनी खुशी नहीं देती।<br>&nbsp; &nbsp;<br>घर में खुदके लिये जो एक अलग कमरे कि माँग के खातिर सबसे लड़ते हैं, यहाँ तो बिना कहे ही हमारा कार्यस्थल अलग ही दे दी जाती है। घर पर कोई हमें इतना महत्व नहीं देते ,यहां तो आते-जाते हरकोई अभिवादन दे जाते हैं। बडे फैसलों पर वो तुम्हें तुम्हारा विचार भी पूछे शायद, घर में तुम्हारे लिये फैसलें लिये जाते है। जिस समय सारणी का अनुसरण करनें का प्रयास तुम कक्षा 6 वीं से कर रहे हो, यहाँ हर चीजें अपने वक्त पर ही कि जाती है।<br><br>हर चीज हम जो सोचते थे उसी अनुसार होती है पर फिर भी हमें क्यों पसंद नहीं आती है? ऐसा क्यों लगता है कि कोई हमारे साथ नही, हमें सबनें अकेला छोड़ दिया हो,और हर छोटी चीजों पर आँखें भी भर आती है मानों हम पर किसी ने ज़ुल्म कि हो। भोजन अवकाश पर पर्याप्त रोटियाँ होंनें पर भी घर की थाली ही याद आती है, रोटियाँ बेशक बहुत होते हैं ,पर 'ठीक से खाओ' कहने &nbsp;वाली आवाज कहीं गुम होती है, मानों किसी दूसरी दुनिया में हम जी रहे हो, हर कोई काम पर जाते हैं, ये आम है बात।<br><br>और हाँ ये जो देख रहे हो न अपने भाई, पापा जी को कि वो कैसे बेफिक्रि के साथ अपना कार्य करते हैं -- ऐसा नहीं है! उनके जीवन मे भी वो वक्त आया था जब उन्होनें ये किस्सा खुदके जीवन मे शामिल किया था थोडा़ टाईम जरूर लगता है पर हर इंसान इस बेफिक्रि को पा ही लेता है।</p>]]></description>
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         <pubDate>2024-01-24 05:16:23 UTC</pubDate>
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