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      <title>अनोखी दोस्ती (by Class IV - E) by viraj uppal</title>
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      <language>en-us</language>
      <pubDate>2020-08-14 03:18:50 UTC</pubDate>
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         <title>लेखक की कलम से (Viraj Uppal)</title>
         <author>virajuppal</author>
         <link>https://padlet.com/virajuppal/elr02x3big6s4hfz/wish/679835878</link>
         <description><![CDATA[<div>“कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति। बिपति-कसौटी जे कसे, सोई सांचे मीत।” सुविख्यात कवि रहिमदास द्वारा रचित इस दोहे के माध्यम से कवि हम से कहता है, जब व्यक्ति के पास संपत्ति होता है तब उसके अनेक सगे-संबंधी तथा मित्र बनते हैं, उसके समीप आते हैं, पर विपत्ती के समय में जो आपका साथ दे, वहीं सच्चा मित्र है।<br><br>व्यक्ति को प्रत्येक रिश्ता अपने जन्म से ही प्राप्त होता है, अन्य शब्दों में कहें तो ईश्वर पहले से बना के देता है, पर दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है जिसका चुनाव व्यक्ति स्वयं करता है। सच्ची मित्रता रंग-रूप नहीं देखता, जात-पात नहीं देखता, ऊँच-नीच, अमीरी-गरीबी तथा इसी प्रकार के किसी भी भेद-भाव का खंडन करती है। आमतौर पर यह समझा जाता है, मित्रता हम-उम्र के मध्य होती है पर यह गलत है मित्रता किसी भी उर्म में और किसी के साथ भी हो सकती है।</div>]]></description>
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         <pubDate>2020-08-14 03:26:16 UTC</pubDate>
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