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      <title>हिंदी साहित्य के भक्ति काल युग के कवियों तथा उनकी प्रमुख रचनाओं का परिचय by TANISHA LODHI</title>
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      <language>en-us</language>
      <pubDate>2023-06-17 08:55:26 UTC</pubDate>
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         <title>हिंदी साहित्य के भक्ति कल के कवियों की चर्चा</title>
         <author>tanishalodhi3017</author>
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         <description><![CDATA[<div><strong><mark>सूरदास</mark></strong><br><br>हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कृष्णभक्त कवि सूरदास का जन्म 1478 ई. के आस-पास हुआ था। इनकी मृत्यु अनुमानत: 1583 ई. के आस-पास हुई। इनके बारे में ‘भक्तमाल’ और ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ में थोड़ी-बहुत जानकारी मिल जाती है। ‘आईने अकबरी’ और ‘मुंशियात अब्बुलफजल’ में भी किसी संत सूरदास का उल्लेख है, किन्तु वे बनारक के कोई और सूरदास प्रतीत होते हैं। अनुश्रुति यह अवश्य है कि अकबर बादशाह सूरदास का यश सुनकर उनसे मिलने आए थे। ‘भक्तमाल’ में इनकी भक्ति, कविता एवं गुणों की प्रशंसा है तथा इनकी अंधता का उल्लेख है। ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ के अनुसार वे आगरा और मथुरा के बीच साधु या स्वामी के रूप में रहते थे। वे वल्लभाचार्य के दर्शन को गए और उनसे लीलागान का उपदेश पाकर कृष्ण-चरित विषयक पदों की रचना करने लगे। कालांतर में श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण होने पर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इन्हें यहाँ कीर्तन का कार्य सौंपा. सूरदास के विषय में कहा जाता है कि वे जन्मांध थे। उन्होंने अपने को ‘जन्म को आँधर’ कहा भी है। किन्तु इसके शब्दार्थ पर अधिक नहीं जाना चाहिए। सूर के काव्य में प्रकृतियाँ और जीवन का जो सूक्ष्म सौन्दर्य चित्रित है उससे यह नहीं लगता कि वे जन्मांध थे। उनके विषय में ऐसी कहानी भी मिलती है कि तीव्र अंतर्द्वन्द्व के किसी क्षण में उन्होंने अपनी आँखें फोड़ ली थीं। उचित यही मालूम पड़ता है कि वे जन्मांध नहीं थे। कालांतर में अपनी आँखों की ज्योति खो बैठे थे। सूरदास अब अंधों को कहते हैं। यह परम्परा सूर के अंधे होने से चली है। सूर का आशय ‘शूर’ से है। शूर और सती मध्यकालीन भक्त साधकों के आदर्श थे।<br><strong>कृतियाँ</strong></div><ul><li>1. सूरसागर</li><li>2. सूरसारावली</li><li>3. साहित्य लहरी</li></ul><div><br><br><br><br></div><div><br><br><br><br></div>]]></description>
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         <pubDate>2023-06-18 17:00:54 UTC</pubDate>
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         <title></title>
         <author>tanishalodhi3017</author>
         <link>https://padlet.com/tanishalodhi3017/d8ughzdgxb5yjzmf/wish/2626386469</link>
         <description><![CDATA[<div><strong><mark>मीराबाई<br></mark></strong><br>ये मेड़तिया के <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC">राठौड़</a> रत्नसिंह की पुत्री, राव दूदाजी की पौत्री और जोधपुर के बसाने वाले प्रसिद्ध <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5_%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A4%BE">राव जोधा</a> की प्रपौत्री थीं। इनका जन्म सन् 1498 ई. में कुड़की नाम के एक गाँव में हुआ था<a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF#cite_note-3"><sup>[3]</sup></a> और विवाह <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0">उदयपुर</a> के महाराणा कुमार <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C_(%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC)">भोजराज</a> के साथ हुआ था। ये आरंभ से ही कृष्ण भक्ति में लीन रहा करती थी। विवाह के उपरांत थोड़े दिनों में इनके पति का परलोकवास हो गया। ये प्राय: मंदिर में जाकर उपस्थित भक्तों और संतों के बीच श्रीकृष्ण <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8">भगवान</a> की मूर्ती के सामने आनंदमग्न होकर नाचती और गाती थी। कहते हैं कि इनके इस राजकुलविरूद्ध आचरण से इनके स्वजन लोकनिंदा के भय से रूष्ट रहा करते थे। यहाँ तक कहा जाता है कि इन्हें कई बार विष देने का प्रयत्न किया गया, पर विष का कोई प्रभाव इन पर न हुआ। घरवालों के व्यवहार से खिन्न होकर ये द्वारका और वृंदावन के मंदिरों में घूम-घूमकर भजन सुनाया करती थीं। ऐसा प्रसिद्ध है कि घरवालों से तंग आकर इन्होंने गोस्वामी <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8">तुलसीदास</a> को यह पद लिखकर भेजा था: स्वस्ति श्री तुलसी कुल भूषन दूषन हरन गोसाईं I बारहिं बार प्रनाम करहुँ, अब हरहु सोक समुदाई II घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई II साधु संग अरू भजन करत मोहिं देत कलेस महाई II मेरे मात पिता के सम हौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई II हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई II इस पर गोस्वामी जी ने ‘विनयपत्रिका’ का यह पद लिखकर भेजा था : जाके प्रिय न राम बैदेही I सो नर तजिय कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही II नाते सबै राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं I अंजन कहा आँखि जौ फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं II मीराबाई की मृत्यु द्वारका में सन् 1546 ई. में हो चुकी थी। अत: यह जनश्रुति किसी की कल्पना के आधार पर ही चल पड़ी. मीराबाई का नाम प्रधान भक्तों में है और इनका गुणगान नाभाजी, ध्रुवदास, व्यास जी, मलूकदास आदि सब भक्तों ने किया है।<br><br></div><div><strong>कृतियाँ</strong></div><ul><li>1. नरसी जी का मायरा</li><li>2. गीतगोविंद टीका</li><li>3. राग गोविंद</li></ul><div><br></div><div><br><br><br></div>]]></description>
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         <pubDate>2023-06-18 17:08:59 UTC</pubDate>
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         <author>tanishalodhi3017</author>
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         <description><![CDATA[<div><strong><mark>गदाधर भट्ट<br></mark></strong><br>ये दक्षिणी ब्राह्मण थे। इनके जन्म का समय ठीक से पता नहीं, पर यह बात प्रसिद्ध है कि ये श्री चैतन्य महाप्रभु को भागवत सुनाया करते थे। इनका समर्थन भक्तमाल की इन पंक्तियों से भी होता है: भागवत सुधा बरखै बदन, काहू को नाहिंन दुखद I गुणनिकर गदाधर भट्ट अति सबहिन को लागै सुखद II संस्कृत के चूडांत पंडित होने के कारण शब्दों पर इनका बहुत विस्तृत अधिकार था। इनका पदविन्यास बहुत ही सुंदर है।<br><br><br><strong><mark>हितहरिवंश</mark></strong></div><div><br>राधावल्लभी सम्प्रदाय के प्रवर्तक गोसाईं हितहरिवंश का जन्म सन् 1502 ई. में मथुरा से 4 मील दक्षिण बादगाँव में हुआ था। राधावल्लभी सम्प्रदाय के पंडित गोपालप्रसाद शर्मा ने इनका जन्म सन् 1473 ई. माना है। इनके पिता को नाम केशवदास मिश्र और माता का नाम तारावती था। कहते हैं कि हितहरिवंश पहले माध्वानुयायी गोपाल भट्ट के शिष्य थे। पीछे इन्हें स्वप्न में राधिकाजी ने मंत्र दिया और इन्होंने अपना एक अलग संप्रदाय चलाया। अत: हित सम्प्रदाय को माध्व संप्रदाय के अंतर्गत मान सकते हैं। हितहरिवंश के चार पुत्र और एक कन्या हुई। गोसाईं जी ने सन् 1525 ई. में श्री राधावल्लभ जी की मूर्ती वृंदावन में स्थापित की और वहीं विरक्त भाव से रहने लगे। ये संस्कृत के अच्छे विद्वान और भाषा काव्य के अच्छे मर्मज्ञ थे। ब्रजभाषा की रचना इनकी यद्यपि बहुत विस्तृत नहीं है तथापि बड़ी सरस और हृदयग्राहिणी है।<br><br></div><div><strong>कृतियाँ–</strong></div><ul><li>1. राधासुधानिधि</li><li>2. हित चौरासी</li></ul><div><br><br></div><div><br><br></div>]]></description>
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         <pubDate>2023-06-18 17:16:37 UTC</pubDate>
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